देश में बढ़ते वायु प्रदूषण के बीच National Green Tribunal ने दक्षिण भारत के राज्यों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। NGT ने साफ कहा है कि “क्लीन एयर फंड” केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका असर जमीन पर दिखाई देना जरूरी है।
ट्रिब्यूनल ने Tamil Nadu समेत कई दक्षिणी राज्यों से छह महीने के भीतर विस्तृत रोडमैप पेश करने को कहा है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि फंड का सही उपयोग नहीं हुआ तो संबंधित राज्यों पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है। (newindianexpress.com)
NGT ने क्या कहा?
NGT ने अपने आदेश में कहा कि केवल बजट आवंटित कर देना पर्याप्त नहीं है। राज्यों को यह दिखाना होगा कि प्रदूषण कम करने के लिए वास्तव में क्या कदम उठाए गए और उनका क्या परिणाम निकला।
ट्रिब्यूनल ने विशेष रूप से उन राज्यों पर चिंता जताई जहां वायु गुणवत्ता सुधार योजनाओं के बावजूद अपेक्षित प्रगति नहीं दिखी। (thehindu.com)
किन राज्यों से मांगी गई रिपोर्ट?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, दक्षिण भारत के कई राज्यों को विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं। इनमें—
- Tamil Nadu
- Karnataka
- Kerala
- Andhra Pradesh
- Telangana
शामिल बताए जा रहे हैं।
NGT ने इन राज्यों से पूछा है कि स्वच्छ हवा अभियान के तहत मिले फंड का उपयोग किन परियोजनाओं में हुआ और उसका प्रदूषण स्तर पर क्या प्रभाव पड़ा।
क्यों बढ़ रही है चिंता?
हालांकि दक्षिण भारत को लंबे समय तक उत्तर भारत की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर वायु गुणवत्ता वाला क्षेत्र माना जाता रहा है, लेकिन तेजी से शहरीकरण, वाहनों की संख्या में वृद्धि, औद्योगिक विस्तार और निर्माण गतिविधियों के कारण कई शहरों में प्रदूषण बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अभी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
फंड खर्च नहीं हुआ तो कार्रवाई संभव
NGT ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि राज्यों ने स्वच्छ हवा योजनाओं को गंभीरता से लागू नहीं किया, तो वित्तीय दंड लगाया जा सकता है।
यह रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि कई बार पर्यावरणीय योजनाओं के लिए बड़ी राशि जारी होने के बावजूद उसका पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता या परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं दिखते।
इनडोर एयर पॉल्यूशन भी बड़ी चुनौती
वायु प्रदूषण केवल बाहरी वातावरण तक सीमित नहीं है। हाल ही में भोपाल की एक शहरी बस्ती में किए गए स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम ने इनडोर एयर पॉल्यूशन यानी घर के अंदर होने वाले प्रदूषण को लेकर भी जागरूकता बढ़ाने की जरूरत बताई है। (cureus.com)
रिपोर्ट के अनुसार, कई परिवार अभी भी ऐसे ईंधन और रसोई व्यवस्थाओं का उपयोग करते हैं जिनसे घर के अंदर खतरनाक धुआं जमा होता है। इससे सांस और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर
विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि खराब वायु गुणवत्ता का असर केवल सांस संबंधी समस्याओं तक सीमित नहीं है।
प्रदूषण के कारण—
- अस्थमा
- फेफड़ों की बीमारी
- हृदय रोग
- बच्चों में विकास संबंधी समस्याएं
- बुजुर्गों में स्वास्थ्य जोखिम
तेजी से बढ़ सकते हैं।
क्या है क्लीन एयर प्रोग्राम?
भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत कई शहरों में प्रदूषण कम करने का लक्ष्य तय किया है। इसके तहत राज्यों और स्थानीय निकायों को फंड उपलब्ध कराया जाता है ताकि वे—
- प्रदूषण निगरानी बढ़ाएं
- सार्वजनिक परिवहन सुधारें
- धूल नियंत्रण उपाय लागू करें
- कचरा जलाने पर रोक लगाएं
- हरित क्षेत्र बढ़ाएं
जैसे कदम उठा सकें।
विशेषज्ञों ने क्या कहा?
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। आम लोगों की भागीदारी और स्थानीय स्तर पर जागरूकता भी बेहद जरूरी है।
विशेष रूप से इनडोर एयर पॉल्यूशन को लेकर अभी भी ग्रामीण और शहरी गरीब इलाकों में पर्याप्त जानकारी की कमी देखी जाती है।
निष्कर्ष
National Green Tribunal का यह सख्त रुख साफ संकेत देता है कि अब केवल घोषणाओं से काम नहीं चलेगा। राज्यों को यह साबित करना होगा कि स्वच्छ हवा के लिए मिले फंड का वास्तविक असर जमीन पर दिखाई दे रहा है। बढ़ते प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिमों के बीच आने वाले छह महीने दक्षिणी राज्यों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।